विश्‍व अर्थराइटिस दिवस : अब युवा भी हो रहे हैं शिकार

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 12, 2012
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Ab yuva bhi ho rahe hai shikarरमन (परिवर्तित नाम) जब सोकर उठता था तो उसे सारा बदन अकड़ा हुआ महसूस होता। यहां तक कि अपनी मुट्ठी बांधने में भी उसे परेशानी होती। यह अर्थराइटिस के लक्षण हो सकते हैं। इस बीमारी का इलाज किया जाना बहुत जरूरी है। भारत में बढ़ते प्रदूषण के कारण भी अर्थराइटिस होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। न सिर्फ बूढ़े बल्कि अब जवान लोग भी इस बीमारी के शिकार बनने लगे हैं।

आमतौर पर अर्थराइटिस होने पर लोग हड्डी के डॉक्टरों के पास जाते हैं, जबकि उन्हें रिमोटोलाजी के डॉक्टर के पास जाना चाहिए। लेकिन इसे बदकिस्‍मती ही कहा जाएगा कि देश के छह अस्पतालों में ही रिमोटोलाजी विभाग हैं। देश में बामुश्‍किल 50 योग्य डॉक्टर हैं, जिन्होंने रिमोटोलाजी में एमबीबीएस किया है, अन्यथा फिजिशयन और हड्डी के डॉक्टर ही इसका इलाज कर रहे हैं। हालांकि देश में इस बीमारी के मरीजों की संख्‍या एक करोड़ पार कर गयी है।

उंगलियों में होने वाले अर्थराइटिस को जहां रूमेटायड अर्थराइटिस कहा जाता है, वहीं ऑस्‍टियो अर्थराइटिस का असर सबसे ज्‍यादा घुटनों पर पड़ता है। उचित जांच से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है और सही समय पर सही इलाज से इससे निजात भी मिल सकती है।

देश के अस्‍पतालों में बड़ी संख्‍या में लोग अर्थराइटिस का इलाज कराने पहुंचते हैं। अधिकतर लोगों को घुटने के दर्द की ही परेशानी होती है। अगर बीमारी शुरू होने के एक साल के अंदर इसका इलाज कर लिया जाए तो यह रोग पूरी तरह से ठीक हो सकता है। अगर इस बीमारी का इलाज सही समय पर नहीं किया जाए तो कई व्‍यक्ति स्‍थायी रूप से विकलांग भी हो सकते हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ उम्रदराज लोग ही इस बीमारी के शिकार होते हैं। आधुनिक जीवनशैली के चलते युवा वर्ग भी बड़ी संख्‍या में इस बीमारी की  चपेट में आ रहा है।

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महिलाओं में प्रसव के बाद या फिर संक्रमण के दौरान रूमेटाइट अर्थराइटिस के लक्षण नजर आते हैं। खून की जांच और अन्‍य शारीरिक लक्षणों के जरिए इस रोग की पहचान की जाती है। और इसके बाद उचित डॉक्‍टरी सलाह और इलाज से मरीज को दर्द से स्‍थायी राहत मिल सकती है।


क्‍या हैं आस्टियो अर्थराइटिस की वजह

घर से दफ्तर और दफ्तर से घर। आधुनिक महानगरीय जीवनशैली बस इन्‍हीं दो स्‍थानों के बीच सिमटकर रह गयी है। और इसी आधुनिक जीवनशैली में शारीरिक श्रम लगातार कम होता जा रहा है। इसी के चलते मोटापा और उससे होने वाली बीमारियां तेजी से अपने पैर पसार रही हैं। अर्थराइटिस भी उनमें से एक है। क्‍योंकि हमारे शरीर का सारा वजन हमारे घुटने उठाते हैं इसलिए बढ़ता वजन सबसे पहले उन्‍हें ही प्रभावित करता है।

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जानकार मानते हैं कि घुटनों में सूजन इस बीमारी का संकेत माना जा सकता है। ऐसी सूरत में डॉक्‍टर से संपर्क करने में देरी नहीं करनी चाहिए। इसके साथ ही चिकित्‍सक सलाह देते हैं कि व्‍यक्ति को अपना वजन काबू में रखना चाहिए। उनकी नजर में यही इसका इलाज भी है और यही इससे बचाव का जरिया भी। और अगर बीमारी बेहद गंभीर रूप धारण कर ले। यहां तक कि मरीज को चलने-फिरने में भी परेशानी होने लगे  तो फिर घुटने के जोड़ों को बदलवाकर इस बीमारी से राहत पायी जा सकती है।

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अर्थराइटिस के कारण-

शरीर का बढ़ता वजन

मोटापा और शरीर का वजन बढ़ना ऑर्थराइटिस की सबसे बड़ी वजह माना जाता है। वजन बढ़ने का असर हमारे शरीर के जोड़ों, विशेषकर घुटनों पर पड़ता है। अधिक दबाव के कारण उनकी कार्यक्षमता पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ने लगता है।

शारीरिक श्रम में कमी

सारा दिन ऑफिस में कुर्सी पर बैठे रहना और शाम को घर आते ही खाना खाकर सो जाना। अगर आपकी दिनचर्या भी कुछ इसी तरह की है तो आपको सावधान होने की जरूरत है। शारीरिक श्रम में कमी न‍ सिर्फ ऑर्थराइटिस बल्कि कई अन्‍य बीमारियों को भी न्‍योता देती है।

बुढ़ापा

उम्र बढ़ने के साथ ही हड्डियों में मौजूद कैल्शियम कम होने लगता है। और उनके बीच घर्षण बढ़ जाता है। परिणामस्‍वरूप हड्डियां कमजोर होने लगती हैं और यह ऑर्थराइटिस की एक बड़ी वजह बनता है।

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यूं बचें बचाव

आरामदायक पतले और मुलायम सोल के जूते ही पहनने चाहिए।
घुटनों को मोड़ कर ज्यादा देर तक काम न करें।
अगर पैरों में दर्द हो उन्‍हें फैलाकर सोएं।
सीढ़ियों पर चढ़ते समय सहारा जरूर लें।
महिलाएं ऊंची एड़ी की सैंडिल या चप्पल न पहनें।
घुटनों को कार्यशील रखें।

 

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