अब इंजेक्‍शन का डर होगा छू

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 31, 2013
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इंजेक्‍शन का दर्द कई लोगों को डराता है। लोग इसके नाम से कोसों दूर भागते हैं। लेकिन, अब वैज्ञानिकों ने इस समस्‍या का हल तलाशने का दावा किया है।

ab injection ka dar hoga chhoo

इंजेक्‍शन का नाम सुनते ही कई लोगों को पसीने आने लगते हैं। इसका दर्द उन्‍हें काफी डराता है। इस डर पर पार पाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक टैटूनुमा पैच विकसित किया है, जो दर्द का अहसास कराए बिना दवा को शरीर के भीतर पहुंचा देगा।

इस टैटूनुमा पैच में रांए जैसे सूक्ष्‍म आकार की कई सुइयां लगी हुई हैं। शरीर पर पैच को चिपकाने से ये सुइयां त्‍वचा के अंदर चली जाती हैं। सूक्ष्‍मा आकार का होने के कारण अंदर जाने के दौरान इनसे चुभन का अहसास नहीं हाता इसलिए मरीज को दर्द नहीं होता। इसकी एक और खासियत यह है कि कई दिनों तक इसका असर कायम रहता है जिससे बार-बार त्‍वचा पर पैच चिपकाने की जरूरत नहीं होती।

वैज्ञानिकों का मानना है कि डीएनए दवाओं को शरीर में पहुंचाने के लिए यह टैटूनुमा पैच काफी असरदार साबित हो सकता है। इससे एचआईवी और कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में मदद मिल सकेगी। एमआईटी के प्रोफेसर डेरेल इरविन ने यह पैच विकसित किया है।

इसकी संरचना के बारे में उन्‍होंने बताया, इसमें पॉलीमर की कई परतें लगाई गई हैं जो डीएनए दवाओं से युक्‍त हैं। पॉलीमर की इन सतहों को रोएं जैसी सुइयों की मदद से शरीर में प्रतिरोपित कर दिया जाता है। ये सुइयां त्‍वचा के अंदर आधा मिली‍मीटर तक चली जाती हैं। त्‍वचा में प्रवेश करने पर पॉलीमर पानी के संपर्क में आता है और छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है। इसके बाद पॉलीमर डीएनए से मिल जाता है। कई दिनों तक इससे डीएनए दवाएं निकती हैं रहती हैं जिससे मरीज को लंबे समय तक फायदा पहुंचता  रहता है।

इरविन बताते हैं, पैच को त्‍वचा पर लगाने के तुरंत बाद ही यह उस पर चिपक जाता है जो देखने में बिल्‍कुल टैटू की तरह लगता है। इसलिए इसे टॅटूनुमा पैच कहा गया है। इसे त्‍वचा पर चंद मिनटों के लिए लगाना है और फिर हटा देना है। इनती देर में ही यह अपना काम कर देता है। वैज्ञानिक बंदरों पर इसका सफल परीक्षण कर चुके हैं ।

परीक्षण के दौरान शोधकर्ताओं ने इस पर खासतौर पर गौर किया कि पैच के असर से बंदरों के शरीर में कितना प्रोटीन बनता है। उन्‍होंने पाया कि पैच लगाने के बाद बंदरों के शरीर में 140 गुना अधिक प्रोटीन का निर्माण हुआ। यह इस बात का साफ सबूत था कि पैच के प्रभाव से बंदरों की प्रतिरोधी क्षमता काफी मजबूत हो गयी थी। उम्‍मीद की जा रही है इनसानों पर किए जाने वाले परीक्षण में भी उन्‍हें कामयाबी मिलेगी।

इरविन कहते हैं कि वर्तमान में जो भी टीके मौजूद हैं वह शरीर के प्रतिरोधी तंत्र को बीमारी के खिलाफ लड़ने में मजबूत करते हैं। लेकिन वैज्ञानिक ऐसे डीएनए टीके विकसित करने में लगे हैं जो मरीज की कोशि‍काओं में स्‍वस्‍थ जीन का प्रतिरोपण करने में सक्षम होते होंगे। इसकी मदद से बीमारी को जड़ से मिटाना संभव होगा। प्रतिरोधी तंत्र इस तरह विकसित हो सकेगा ताकि बीमारी के आने से पहले उसके लिए तैयार रह सके।

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