होम्योपैथी के विषय में संपूर्ण जानकारी

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Jan 02, 2013
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होमियोपैथी एक प्रकार की वैकल्पिक चिकित्सा है, इसके प्रारंभ(1796) का श्रेय जर्मन फिजिशियन सैमुएल हैनीमैन को जाता है। होमियोपैथी का आधारभूत सिद्धांत लगभग 2500 साल पहले हिप्पोक्रेटिस के द्वारा वर्णित किया गया था, जिन्हें आधुनिक चिकित्सा का जनक माना जाता है। उनके अनुसार, रोगों को या तो समान(जैसे-होमियोपैथी), या विपरीत(ऑर्थोडॉक्स चिकित्सापद्धति) चीजों से ठीक किया जा सकता है। वर्तमान में प्रचलित होमियोपैथी का विकास लगभग 200 साल पहले महान जर्मन फिजिशियन एवं विद्वान डॉ. सैमुएल हैनीमैन के द्वारा हुआ।

 

होमियोपैथी चिकित्सा औषधियों के विषय में ज्ञान और इसके अनुप्रयोगों पर आधारित है जिसमें होमियोपैथिक फॉर्मेकोपिया ऑफ युनाइटेड स्टेट्स भी शामिल है। यह फॉर्मेकोपिया यू.एस.एफ.डी.ए द्वारा मान्यता प्राप्त है। फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए या यूएसएफडीए) यूएसए में दवाओं संबंधी सुरक्षा मापदंडों का नियंत्रण एवं निगरानी करता है। होमियोपैथी एक ग्रीक शब्द है, जिसका अर्थ है-“समान पीड़ा”। इस चिकित्सा पद्धति में रोगों का ऐसे प्राकृतिक पदार्थों से इलाज किया जाता है, जो स्वस्थ व्यक्ति को ज्यादा खुराक में देने पर उसी रोग के लक्षण उत्पन्न करता है, जिसके इलाज में इसका उपयोग किया जाता है। रोगी को रोग के समान लक्षण उत्पन्न करने वाली दवा की हल्की खुराक दी जाती है, ताकि यह पदार्थ शरीर की प्राकृतिक रोगनिरोधी क्षमता को उत्प्रेरित कर रोग की जड़ से समाप्ति कर सके। टीकाकरण में होमियोपैथिक सिद्धांत प्रयोग में आता है। सन1800 ई. जब टीकाकरण की खोज हुई, काउपॉक्स के रोग उत्पन्न करनेवाले पदार्थ को मनुष्य के शरीर में इंजेक्शन के द्वारा डाला जाता था, जिससे कि शरीर में उसके प्रति रोगनिरोधी क्षमता पैदा हो और स्मॉल पॉक्स से बचा जा सके।

 

होम्‍योपैथी के फायदे

 

होमियोपैथी की लोकप्रियता आज तेजी से बढ रही है और प्रचलित एलोपैथ चिकित्सा पद्धति के बाद यह सबसे अधिक पसंद की जानेवाली और प्रयोग में लाई जाने वाली चिकित्सा पद्धति है।

  • होमियोपैथ पाचन तंत्र को व्यवधान नहीं पहुंचाता और ना ही वह एंटीबायोटिक्स की तरह प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है। होमियोपैथिक दवाएं सुरक्षित होती हैं और एलोपैथ दवाओं के विपरीत, ये दवाएं सामान्यतः साइड इफैक्ट रहित होती हैं एवं कोई ढांचागत क्षति नहीं पहुंचाती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि होमियोपैथिक दवाएं कोई रासायनिक क्रिया नहीं करतीं और शरीर के अपने प्रतिरक्षा प्रणाली एवं रोग निदान की शक्ति को उत्तेजित करती हैं।
  • ये दवाएं-नवजात शिशु, बच्चों, गर्भवती स्त्रियों, दुग्धपान करानेवाली माताओं एवं वृद्ध लोगों के लिए सुरक्षित है और इनके खुराक की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है।
  • होमियोपैथिक दवाएं एक्यूट और क्रॉनिक दोनों प्रकार के रोगों में प्रभावी होती हैं। मात्र इस पद्धति में कई ऐसी क्रॉनिक बीमारियों का इलाज होता है, जो दूसरी पद्धति में असाध्य मानी जाती हैं।
  • विभिन्न एक्यूट और क्रॉनिक रोगों के अतिरिक्त यह कई एलर्जिक रोगों में भी प्रभावकारी है।
  • अधिकांश होमियोपैथ दवाएं मीठी गोलियों के रूप में दी जाती हैं, जिन्हें लेना बहुत आसान होता है। बच्चे प्रायः होमियोपैथिक दवाएं लेने के लिए आसानी से तैयार हो जाते हैं।
  • होमियोपैथिक दवाएं लेने से इनकी आदत या इन पर निर्भरता विकसित नहीं होती। इन दवाओं को मनुष्य पर आजमाकर इनके प्रभाव को परखा जाता है, जानवरों पर नहीं।
  • एलोपैथिक और आयुर्वेदिक की तुलना में होमियोपैथिक दवाएं सस्ती होती हैं। चूंकि इस पद्धति में डॉक्टर रोग की पहचान करने एवं दवा का चयन करने के लिए लक्षणों पर भरोसा करते हैं, रोग की पहचान की प्रक्रिया मंहगी नहीं होती।
  • होमियोपैथी में मनुष्य को अंगों का एक समूह नहीं, बल्कि एक इकाई मानकर उसका पूरा इलाज किया जाता है। इसलिए शरीर के अलग-अलग भागों का इलाज कराने के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों के पास जाने की आवश्यकता नहीं। इस प्रकार यह एलोपैथ से सस्ती पद्धति है।

होमियोपैथिक दवाएं कई प्रकार के एक्यूट और क्रॉनिक रोगों में प्रभावी होती हैं। चूंकि यह एक प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति है, इसका उपयोग किसी भी व्यक्ति(नवजात शिशु, बूढे लोगों, गर्भवती स्त्रियों) के लिए हो सकता है। होमियोपैथिक दवाएं दुनिया भर में उपयोग में लाई जाती हैं, और खासकर भारत में काफी पसंद की जाती हैं।

 

प्राथमिक चिकित्सा

 

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