स्टेम सेल से ब्लड कैंसर का इलाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 30, 2012
Comment

हेल्‍थ संबंधी जानकारी के लिए सब्‍सक्राइब करें

Like onlymyhealth on Facebook!

stem koshika se blood cancer ka upchaarकैंसर के इलाज में इस्तेमाल की जाने वाली कीमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी आदि से कैंसर सेल्स के साथ सामान्य सेल्स भी नष्ट हो जाती है। कीमोथेरेपी में दी जाने वाली दवाईयां विशेष रुप से अस्थि मज्जा (बोन मेरो) के रक्त बनाने वाली कोशिकाओं को नुकसान पहुंचा सकती है। ल्यूकीमिया के प्रभावकारी ईलाज के लिए दवा की हाई डोज की जरुरत होती है। लेकिन डॉक्टरों ने इस समस्या का सामाधान खोज निकाला है स्टेम कोशिकाओं के ट्रांसप्लांट के जरिए।  

 

स्टेम सेल्स अस्थि मज्जा की रक्त बनाने वाली कोशिकाएं हैं ये लगातार धमनियों व शिराओं में नई रक्त कोशिकाओं को विभाजित करता है। स्टेम सेल ट्रांसप्लांट कीमोथेरेपी व रेडिएशन थेरेपी को मजबूत बनाने में सक्षम है जिससे ल्यूकीमिया के सेल्स को खत्म किया जा सके। क्षतिग्रस्त बोन मेरो को स्टेम सेल से ट्रांसप्लांट कर देते हैं जिससे नई रक्त कोशिकाएं बन सकें।

 

आईए जानें ट्रांसप्लांट के लिए स्टेम कोशिकाएं कहां से मिलती हैं 

 

  • अस्थि मज्जा।
  • सफेद रक्त कोशिकाओं।
  • अंबिकल कॉर्ड (umbilical cord) कोशिका।

 

ये कोशिकाएं सावधानीपूर्वक स्टोर करके रखी जाती है जब तक रोगी का ल्यूकीमिया को खत्म करने के लिए हाई डोज की दवाएं दी जाती हैं। यह ट्रांसप्लांट कीमोथेरेपी के तीन दिन के कोर्स के बाद किया जाता है।

 

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट दो तरह का होता है।

ओटोलोगस एससीटी

 

 

ओटोलोगस स्टेम सेल ट्रांसप्लांट को ओटोलोगस बोन मेरो ट्रांसप्लांट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें रोगी के अस्थि मज्जा से ही स्टेम सेल निकाल कर ही उसको ट्रांसप्लांट करते हैं। स्टेम कोशिकाओं के ट्रांसप्लांट के लिए इस तकनीक का उपयोग बहुत कम होता है क्योंकि इसमें सामान्य कोशिकाओं के ल्यूकीमिया से प्रभावित होने का खतरा होता है।

ऐलोजेनिक एससीटी

 

ऐलोजेनिक एससीटी को एलोजेनिक बोन मेरो ट्रांसप्लांट के नाम से भी जाना जाता है। इसमें किसी अन्य व्यक्ति के स्वस्थ सेल्स मिला करके रोगी के क्षतिग्रस्त सेल्स से स्थानांतरित कर देते हैं। इसके लिए रोगी के परिवार वालों में से ही किसी व्यक्ति को चुना जाता है क्योंकि उनके सेल्स रोगी के सेल्स से मिलते हुए होते हैं। एलोजेनिक डोनर सेल्स रोगी को ल्यूकीमिया सेल्स से लड़ने में मदद करते हैं।

रोगी की देखभाल

 

ट्रांसप्लांट के बाद रोगी को अस्पताल में विशेष देख रेख में रखा जाता है और जब तक उसकी सफेद रक्त कोशिकाओं की संख्या 500 से ज्यादा नहीं हो जाए तब तक उसका ख्याल रखा जाता है। दो या तीन हफ्ते में स्टेम सेल सफेद कोशिकाएं बनाना शुरु कर देते हैं उसके बाद वो प्लेटलेट्स का भी निर्माण करने लगते हैं। उसके कई हफ्तों बाद लाल रक्त कोशिकाओं का भी बनना शुरु हो जाता है।

Write a Review
Is it Helpful Article?YES3 Votes 12465 Views 1 Comment
प्रतिक्रिया दें
disclaimer

इस जानकारी की सटिकता, समयबद्धता और वास्‍तविकता सुनिश्‍चित करने का हर सम्‍भव प्रयास किया गया है । इसकी नैतिक जि़म्‍मेदारी ओन्‍लीमाईहैल्‍थ की नहीं है । डिस्‍क्‍लेमर:ओन्‍लीमाईहैल्‍थ पर उपलब्‍ध सभी साम्रगी केवल पाठकों की जानकारी और ज्ञानवर्धन के लिए दी गई है। हमारा आपसे विनम्र निवेदन है कि किसी भी उपाय को आजमाने से पहले अपने चिकित्‍सक से अवश्‍य संपर्क करें। हमारा उद्देश्‍य आपको रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी मुहैया कराना मात्र है। आपका चिकित्‍सक आपकी सेहत के बारे में बेहतर जानता है और उसकी सलाह का कोई विकल्‍प नहीं है।

टिप्पणियाँ
  • reeta03 May 2012

    good info

संबंधित जानकारी
  • सभी
  • लेख
  • स्लाइडशो
  • वीडियो
  • प्रश्नोत्तर