केवल दर्द से राहत पाने के लिए ही सिजेरियन करवाना सही नहीं, इसके लिए होनी चाहिए उपयुक्‍त परिस्थितियां

By  ,  सखी
Feb 18, 2013
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Quick Bites

  • सिजेरियन में जन्म दर्द भले ही कम हो, लेकिन बाद में कई परेशानियां हो सकती हैं।
  • सिजेरियन डिलीवरी में सामान्‍य डिलिवरी के मुकाबले तीन गुना तक अधिक ब्‍लड लॉस होता है।
  • केवल 12 प्रतिशत स्त्रियां ही ऑपरेशन द्वारा प्रसव कराने की स्थिति में होती हैं।
  • रिकवरी के बाद भी दूसरे बच्‍चे के लिए आपको काफी सोच समझकर लेना होगा फैसला।

 

बच्चे को जन्म देना संसार की सबसे विलक्षण अनुभूति है। इस सृजन की पूरी प्रक्रिया पर यदि नजर डालें तो सामान्य वजाइनल प्रसव के केसेज को ही विशेषज्ञ डिलीवरी का आदर्श तरीका मानते हैं।

सिजेरियनहालांकि ऐसे भी कई वजहें और स्थितियां होती हैं, जिनके चलते सामान्य प्रसव को कभी-कभी सिजेरियन करना पडता है। लेकिन सिजेरियन की बढती संख्या यह बता रही है कि आम स्त्री व उसके परिवार वाले नहीं जानते कि सिजेरियन द्वारा बच्चे को जन्म देने के पीछे कितनी प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष तकलीफें हो सकती हैं।

 

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सामान्य नहीं है

नैचुरल तरीके से बच्चे को जन्म देना व सिजेरियन द्वारा प्रसव कराना दोनों ही एकदम विपरीत स्थितियां हैं। जहां पहले तरीके से जन्म देने में असहनीय कष्ट होता है, वहीं दूसरे में जन्म भले ही बिना तकलीफ के हो रहा हो, पर बाद में कष्टों की गिनती नहीं रहती। आप सामान्य प्रसव की तुलना में असामान्य स्थितियों का सामना सिजेरियन में करती हैं। भले ही स्त्री कितना भी धैर्य रखें, लेकिन सिजेरियन द्वारा शिशु को जन्म देने के बाद भी वह एक बीमार व रोगी की तरह रहती है, स्वस्थ सामान्य इंसान की तरह नहीं। चाहे कितनी भी आधुनिक तकनीक अपनाई गई हो, लेकिन इतने बडे ऑपरेशन के बाद आप चलना-फिरना तो दूर हिलना-डुलना भी मुश्किल हो जाता है। यहां तक कि खांसने और हंसने में भी तकलीफ होती है। न करवट बदल सकती हैं और न चैन की नींद ले सकती हैं। अपने हर जरूरी काम के लिए आपको दूसरे का सहयोग चाहिए होता है।

बच्चे से दूर

लंबी प्रतीक्षा व असहनीय कष्ट के बाद बच्चे को जन्म देने पर भी मां को उससे चौबीस घंटे दूर रहना पडता है। यह जन्म देने की पीडा से भी बडी पीडा है। वह ठीक से उठ-बैठ नहीं सकती। चौबीस घंटे डॉक्टरों और नर्सो के निरीक्षण में रहती है। जिस बच्चे को सीने से लगाते ही स्त्री सारे दर्द भूल जाती है, उस अतुलनीय सुख से सिजेरियन वाली मां वंचित रह जाती है।

रिकवरी में समय

ऑपरेशन कितना भी सुरक्षित और बेहतरीन तरीके से हुआ हो सामान्य प्रसव की तुलना में सिजेरियन में स्त्री को रिकवर करने में कहीं अधिक समय लगता है। शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्थितियां अनुकूल होने में देर लगती है। सामान्य न रह पाने के कारण खान-पान, फिटनेस तथा अन्य कई चीजों के नियमित दिनचर्या का हिस्सा बनने में देर लगती है।

 

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ब्लड लॉस

सामान्य प्रसव में यदि दो से तीन चार सौ एम.एल. ब्लड लॉस होता है, तो सिजेरियन डिलीवरी में यह नुकसान दो से तीन गुना ज्यादा होता है। कई बार ऑपरेशन के दौरान हेवी ब्लीडिंग के कारण खून तक चढाना पड जाता है। यह स्थिति भी आसान नहीं है स्त्री के लिए। इसलिए जरूरी न हो तो सिजेरियन से बचना ही ठीक है।

 

भावी मुश्किलें

भले ही आप कितना भी सहयोग दें और कितनी भी जल्दी रिकवर हो जाएं लेकिन दूसरी संतान की प्लानिंग के लिए फैसला सोच-समझ कर लेना होगा। यूट्रस कमजोर होने के कारण अवांछित संतान के लिए गर्भपात भी सोचकर कराना पडेगा। यहां तक कि परिवार नियोजन के तरीके भी सुरक्षित अपनाने होंगे। कोई भी ऐसा काम जो पहले से कमजोर यूट्रस को और कमजोर करे, करने से बचना चाहिए।

स्वाभाविक दिक्कतें

अकसर सिजेरियन डिलीवरी के केसेज में स्त्री को सामान्य हो अपने बच्चे को दूध पिलाने में जो देरी होती है व साथ ही बैठने में जो कष्ट होता है उससे दूध कम हो जाता है। स्त्री के बेड रेस्ट से बच्चे को ऊपरी दूध देने से यह समस्या और बढ जाती है। क्योंकि न तो बच्चे को आदत रहती है और न ही मां तकलीफ उठाने में सक्षम होती है। दूध जितना पिलाएं उतना ही होता है। न पिलाने पर यह स्वत: कम होता चला जाता है। बच्चे केलिए मां का दूध अमृत की तरह है। वजाइनल डिलीवरी में प्रेशर से नवजात बच्चा स्वत: बहुत सी चीजें सीख लेता है जो उसके सेहत के लिए अच्छी रहती हैं। जैसे रोने से फेफडे का फैलना। कैथेड्रल लगाने के कारण युरिनरी इन्फेक्शन का डर होता है। ऑपरेशन में शरीर ओपन होने के कारण नाजुक अंग छू जाने का भय भी रहता है।

हाइजीन की चिंता

इस बात का खयाल विशेष रूप से रखना पडता है कि ऑपरेशन के बाद विशेष एतिहयात की जरूरत होती है। हाइजीन का पूरा ध्यान रखना पडता है। इसके साथ अति संवेदनशील होने के कारण ईचिंग और एलर्जी के प्रति भी सजग रहना पडता है।

शायद आम इंसान यह नहीं जानता कि सौ में से केवल 12 प्रतिशत स्त्रियां ही ऑपरेशन द्वारा प्रसव कराने की स्थिति में होती हैं। बाकी जितने भी सिजेरियन होते हैं वे या तो मरीज द्वारा आग्रह करने या डॉक्टर के जोर देने पर किए जाते हैं। डब्लू.एच.ओ. के एक आंकडे के अनुसार इन दिनों पांच में से एक प्रसव ऑपरेशन के जरिये हो रहा है। ऐसे मामलों की संख्या में तकरीबन 27 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है। इनमें से इमरजेंसी केस को छोड दें तो 15 प्रतिशत मामले पैसे बनाने के हैं। आप यह जान लें कि प्रेगनेंट होने से लेकर बच्चे को जन्म देने तक की प्रक्रिया बेहद सामान्य है। इसे खुले ओर अच्छे मन से एंजॉय करें और एकदम सामान्य तौर पर लें। बच्चे का जन्म किसी डर या आतंक का विषय नहीं संसार की सबसे सुखद और अतुलनीय उपलब्धि है। बहुत सी स्त्रियां यह नहीं जानतीं किवे सामान्य प्रसव से इंकार कर उससे होने वाले लाभों से न केवल खुद वंचित होती हैं, बल्कि बच्चे को भी रखती हैं। खुद पर और अपनी डॉक्टर पर भरोसा रखिए और प्रसव की डेट निकल जाने पर यदि स्थितियां सामान्य हैं तो धैर्य मत खोइए। आपकी हिम्मत ही सामान्य प्रसव की कोशिश को सफल बनाएगी।

 

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स्थितियां जो 'सी-सेक्शन' के लिए जिम्मेदार हैं

1. पहली बार मां बनने जा रही हों और बच्चा उल्टा हो।

2. ट्विंस या मल्टिपल प्रेगनेंसी हो, या बच्चों में से एक आडा या उल्टा हो।

3. प्लासेंटा नीचे की ओर होने पर। हालांकि सामान्य तौर पर ऐसे केसेज में सिजेरियन नहीं किया जाता लेकिन जिस रास्ते से बच्चे को आना है, वहां अगर यह प्लासेंटा बीच में अड रहा हो तो सिजेरियन करना ठीक रहता है।

4. यदि प्रसव की दी गई डेट निकल गई हो और बच्चे की ग्रोथ उसके और मां लिए खतरनाक हो।

5. यदि ब्लड प्रेशर या यूरिक एसिड बढा हुआ हो। बीपी से दिमाग पर असर होने के कारण दौरे पडने लगें।

6. यदि प्रेगनेंट स्त्री किसी प्रकार की बीमारी या शारीरिक अक्षमता की शिकार हो।

7. यदि पहला प्रसव सिजेरियन हो।

8. यदि यूट्रस में फायब्रायड्स हों और वे रास्ते में आ रहे हों।

9. यदि बच्चे का वजन ज्यादा हो और वह वजाइनल डिलीवरी के लिए सक्षम न हो।

 

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