ल्‍यूकीमिया की चिकित्‍सा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 11, 2013
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ल्यूकीमिया ब्लड कैंसर का ही एक प्रकार है जो बहुत ही प्रचलित है। ऐसा माना जाता है कि ल्‍यूकीमिया से ग्रस्‍त छह मरीजों में से एक की ही जान बच पाती है। ल्‍यूकीमिया के शुरूआती स्‍टेज में अगर पता चल जाए तो इसका इलाज संभव है।

leukemia ki chikitsaल्यूकीमिया से जूझ रहे मरीज के पास ईलाज के कई विकल्प हैं। कीमोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी, बॉयोलॉजिकल थेरेपी और स्टेम सेल ट्रांसप्लांट थेरेपी। अगर ट्यूमर बड़ा है तो डॉक्टर इसकी सर्जरी करने की सलाह देते हैं।

 

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कैंसर की सभी थेरेपीज़ में ल्यूकीमिया की चिकित्सा सबसे गहन है।

इस चिकित्सा में शरीर को रोग प्रतिरोधी क्षमता और संक्रमण से बचाने के लिए गंभीर उपाय करने पड़ते हैं, इसके कारण मरीज़ को ठीक होने के लिए बहुत ही सहायक देखभाल की आवश्यकता होती है। ल्यूकीमिया के मरीज़ों की चिकित्सा ऐसे मेडिकल सेन्टर में होती है जहां पर इस रोग के उपचार के विशेषज्ञ होते हैं और यह व्यक्ति की इम्यून सप्रेशन के दौरान मरीज़ का आत्मबल बढ़ाते हैं। आइए जानें ल्‍यूकीमिया की चिकित्‍सा इसके भिन्‍न-‍भिन्‍न प्रकार में कैसे होती हैं।

एक्यूट ल्यूकीमिया
एक्यूट ल्यूकीमिया की चिकित्सा मरीज़ की स्थिति पर निर्भर करती है। साथ ही इस बात का भी ध्‍यान रखा जाता है कि व्यक्ति का परीक्षण हाल में हुआ है या वो पहले से किसी प्रकार की थेरेपी ले रहा है या इलाज के बाद बीमारी फिर से तो नही हो रही है।

एक्यूट लिम्फोसाइटिक ल्यूकीमिया के साथ चिकित्सा के कई चरण होते हैं। हालांकि सभी लोगों के लिए सभी चरण का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।

 

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फेज 1, इन्डक्शनल थेरेपी में अस्पताल में कीमोथेरेपी का भी इस्तेमाल किया जाता है जिससे कि बीमारी को नियंत्रित किया जा सके।

फेज 2, कन्सोलिडेशन में भी कीमोथेरेपी की जाती है, लेकिन यह चिकित्सा आउटपेशेंट के आधार पर होती है। जैसे कि जब मरीज़ चिकित्सा के लिए दोबारा अस्पाताल आता है और उसे अस्पसताल में भर्ती नही होना होता है।

फेज 3, प्रोफिलैक्सिस में अलग–अलग प्रकार की कीमोथेरेपी की ड्रग्स का इस्तेमाल किया जाता है और कभी–कभी इसे रेडियेशन की चिकित्सा के साथ दिया जाता है जिससे कि ल्यूकीमिया दिमाग में या सेन्ट्रल नर्वस सिस्टिम तक ना जा सके।

फेज 4, मेंटेनेंस में नियमित शारीरिक परीक्षण किया जाता है और ल्यूकीमिया की चिकित्सा के बाद भी प्रयोगशाला में जांच की जाती है जिससे यह पता लगाया जा सके कि ल्यूकीमिया कहीं दोबारा तो नहीं हुआ है।

रिकरेंट ल्यूकीमिया में अलग–अलग कीमोथेरेपी की अलग–अलग डोज दी जाती है जिससे कि यह बीमारी दोबारा ना होने पाये। कुछ लोगों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट भी किया जाता है। एक्यूट माइलायड ल्यूकीमिया की चिकित्सा मुख्यत: मरीज़ की उम्र पर और बीमारी के प्रकार पर निर्भर करती है।

सभी प्रकार के एक्यूट ल्यू‍कीमिया के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट एक विकल्प होता है जबकि कीमोथेरेपी मात्र प्रभावी नहीं होती।

[इसे भी पढ़ें : ल्यूकीमिया के प्रकार]

 
क्रोनिक ल्यूकीमिया

क्रोनिक लिम्फो‍साइटिक ल्यूकीमिया के लिए निदान के बाद दूसरा चरण होता है कैंसर की सीमा का पता लगाना। इसे स्टेजिंग कहते हैं। क्रोनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकीमिया के चार चरण हैं :

स्टेज 0: इस स्थिति में ब्‍लड में बहुत से लिम्फोसाइट्स बन जाते हैं। जिससे ल्यूकीमिया के दूसरे लक्षण नहीं दिखते।

स्टेज 1: ब्‍लड में बहुत से लिम्फोसाइट्स होने के कारण लिम्फ नोड्स सूज जाते हैं।

स्टेज 2: लिम्फ नोड्स, स्प्‍लीन और लीवर सूज जाते हैं जिसके कारण लिम्फोंसाइट्स की मात्रा भी बढ़ जाती है ।

स्टेज 3: रक्त में रेड ब्लड सेल्स की कमी होने के कारण एनीमिया हो जाता है।

स्टेज 4: रक्त में प्लेट्स की कमी हो जाती है। लिम्फ नोड्स, स्प्‍लीन और लीवर सूज जाते हैं। ऐसे में एनीमिया के होने की भी सम्भावना रहती है। क्रोनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकीमिया की चिकित्सा‍ के लिए ल्यूकीमिया बीमारी की स्टेज पर और मरीज़ की उम्र और स्वास्‍‍थ्य पर निर्भर करता है।

बीमारी के शुरूआती स्टेज में चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती और मरीज़ के सम्पूर्ण स्वास्‍थ्‍य की देखभाल की जाती है।

 


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