बोन मेरो ट्रांसप्लांट से संभव है कैंसर का इलाज

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Mar 29, 2012
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बोन मेरो ट्रांसप्लांट यानी अस्थि मज्जा प्रत्यारोपण से कैंसर का इलाज करना बहुत ही जटिल काम है। बोन मेरो ट्रांसप्लांट के दौरान पीडि़त व्यक्ति की प्रभावित बोन मेरो को हेल्दी बोन मेरो से बदल दिया जाता है।

bone marrow transplant se sambhav hai cancer kaइस ट्रांसप्लांट के बाद हेल्दी और नई कोशिकाएं शरीर में मौजूद संक्रमण से लड़ने में मदद करती है और बीमार व्यक्ति अपने को पहले से अधिक स्वस्थ महसूस करने लगता है। इलाज के बाद मरीज का इम्यून सिस्टम पहले से कहीं अधिक बेहतर हो जाता है और वह कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में भी मदद करता है। आमतौर पर बोन मेरो ट्रांसप्लांट मरीज का बोन कैंसर के लिंफोमा, मल्टीपल माइलोमा और ल्यूकेमिया इत्यादि से ग्रसित होने पर किया जाता है।


हाल ही में आए शोधों के अनुसार, 1995 से 1999 के बीच लगभग 329 मरीजों का बोन मेरो ट्रांसप्लांट किया गया जिनमें से लगभग 56.5 फीसदी लोग जीवित हैं। हालांकि कई बार कैंसर के मरीजों पर बोन मेरो ट्रांसप्लांट तकनीक के इस्तेमाल के बाद कोई असर नहीं होता जिस कारण कैंसर उनमें लगातार बढ़ता जाता है और ऐसे मरीजों को असमय मौत का जोखिम हो जाता है। उदाहरण के तौर पर स्तन कैंसर। बहुत से शोधों में यह भी बात सामने आई है कि बोन मेरो ट्रांसप्लांट का ब्रेस्ट कैंसर मरीजों पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

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कैंसर ट्रीटमेंट के लिए तीन तरह के बोन मेरो ट्रांसप्लांट का इस्तेमाल किया जाता है -




ऑटोलॉगस: यह विधि तब प्रयोग में लाई जाती है जब मरीज को इलाज के लिए बोन मेरो ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है। इस थेरेपी को शुरू करने से पहले मरीज की हेल्दी बोन मेरो पहले निकाल ली जाती है।



एलोजेनिक Allogeneic: इस विधि में बोन मेरो किसी अन्य व्यक्ति से लिया जाता है। लेकिन इसमें डोनर की बोन मेरो मरीज से मैच करनी चाहिए। इसके लिए डॉक्टर द्वारा ह्यूमन ल्युकोसैट एंटीजेन टेस्ट किया जाता है। यदि डोनर मैच कर जाता है तो दोनों का ब्लड ग्रुप चैक किया जाता है। उसके बाद ही इस विधि के जरिए बोन मेरो ट्रांसप्लांट होती है।



सिन्जेनिक Syngeneic: बोन मेरो ट्रासंप्लांट के लिए इस विधि को बहुत ही कम प्रयोग में लाया जाता है। इस विधि में ट्विंस बोन मेरो का मैच करना जरूरी है यानी मरीज के लिए प्रयोग में लाई जाने वाली बोन मेरो एक जैसी होनी चाहिए। इस कंडीशन के कारण ही इस विधि का बहुत कम इस्तेमाल होता है।

 

[इसे भी पढ़ें : ऐस उपाय जो कैंसर से बचायें]

    

स्टेम सेल ट्रांसप्लांट और बोन मेरो ट्रांसप्लांट दोनों को ही जीवन बचाने के लिए उपयोग में लाया जाता है। लेकिन कैंसर पीडि़तों का जीवन बचाने के लिए यही एकमात्र सोल्युशन नहीं है। वैसे भी बोन मेरो ट्रांसप्लांट हर किसी मरीज के लिए उपयोगी नहीं है। इतना ही नहीं बोन मेरो ट्रांसप्लांट और इस तरह की तकनीको का प्रभाव जितना युवाओं पर पड़ता है उतना बड़ी उम्र के व्यक्ति पर नहीं पड़ता। बोन मेरो ट्रांसप्लांट जैसी तकनीकों की सफलता के लिए उम्र बहुत बड़ा फैक्टर है। क्या आप जानते हैं 55 साल के आसपास की उम्र के लोगों पर बोन मेरो ट्रांसप्लांट तकनीक को नहीं अपनाया जा सकता। इतना ही नहीं बोन मेरो ट्रांसप्लांट से पहले मरीज की स्थिति, उसकी शारीरिक क्षमता और बीमारी की स्टेज इत्यादि का भी ध्यान रखा जाता है।

 
कैंसर के रोगियों को बोन मेरो ट्रांसप्लांट का उपचार देने से पहले डॉक्टर्स द्वारा कीमीथेरेपी और रेडिएशन थेरपी दी जाती है जिससे मरीज को नुकसान पहुंचाने वाले कैंसर के सेल्स को नष्ट किया जा सकें। बोन मेरो ट्रांसप्लांट के दौरान मरीज को रक्त की बहुत जरूरत होती है। कई बार बोन मेरो ट्रांसप्लांट के बाद मरीज को कई महीने भी लग सकते हैं अपनी हालत को सुधारने में। इतना ही नहीं मरीज का इम्यून सिस्टम मजबूत होने में भी काफी वक्त लग जाता है।

 

 

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टिप्पणियाँ
  • reeta04 May 2012

    good info nd nice article

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