निराशावादियों को हृदय से जुड़ी बीमारियों का खतरा

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Apr 06, 2013
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आशावादी बनाम निराशावादीगिलास को आधा भरा या आधा खाली देखना आपके नजरिए पर निर्भर करता है। और यही नजरिया किसी की जिंदगी भी बचा सकता है। अगर कोई व्‍यक्ति दिल का मरीज है तो उसका नकारात्‍मक नजरिया (गिलास को आधा खाली देखना) उसकी स्थिति को और बिगाड़ सकता है, वहीं अगर वह हालात का सामना अधिक सकारात्‍मक दृष्टिकोण के साथ करता है, तो यह उसके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी लाभप्रद रहेगा।

 

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सही तरीके का खान पान और स्वस्थ जीवनशैली एक स्वस्थ जीवन के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी है किसी भी इन्सान का साइकोलॉजिकल रवैया। शारिरिक और मानसिक तौर पर स्वस्थ व्यक्ति ही सही मायनों में स्वस्थ माना जाता है।

मोटापा, धूम्रपान, शराब का सेवन आदि हृदय से जुड़ी समस्याओं के कुछ सामान्य कारण हैं। हाल के हुए शोधों से पता चलता है कि तनाव, डिप्रेशन और निराशा भी पुरूषों और स्त्रियों दोनों में ही हृदय से जुड़ी समस्याओं को बढ़ाती हैं।

रजोनिवृति महिला पर हुए एक सर्वे से पता चला कि "वो महिलाएं जो आशावादी हैं, उनमें हृदय से जुड़ी समस्याओं के होने का खतरा कम रहता है।"

इस तरह के सर्वे को देखकर डाक्टर दिल और दिमाग में संतुलन बनाये रखने और आशावादी की राय देते हैं। आशावादी लोगों में कामन कोल्ड से लड़ने के लिए इच्‍छा शक्ति भी अधिक होती है।

 

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निराशावादी मरीजों को अपनी लाइफस्टाइल और डाक्टर के द्वारा दी गयी दवाओं पर भी ध्यान देना चाहिए। मरीज़ जिनकी बाइपास सर्जरी हुई है, उनमें कार्डियोलाजिस्ट्स ने पाया कि निराशावादी मरीजों की तुलना में आशावादी मरीज़ जल्दी ठीक हुए हैं।

आशावादी लोगों के दिमाग के बांये प्रिफ्रंटल लोब ज़्यादा एक्टिव होते हैं जबकि इनकी तुलना में निराशावादी लोगों के दिमाग के दाहिने प्रिफ्रंटल लोब ज़्यादा एक्टिव होते हैं।

निराशावादी लोग अपनी बीमारियों का और अपनी लाइफस्टाइल का ठीक से ख्याल नहीं रख पाते। क्‍योंकि कोई इन्‍सान जो अपने जीवन का महत्व नहीं समझता वो जिम जाने का जोखिम क्यों उठाएगा। इसलिए निराशावादी लोग, आशावादी लोगों की तुलना में अच्छी लाइफस्टाइल नहीं जी पाते।

शोधों से ऐसा भी पता चला है कि निराशावादी लोगों को डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, हाई कालेस्ट्राल और डिप्रेशन जैसी बीमारियों के होने का खतरा ज़्यादा रहता है। निराशावादी लोगों में ओवरवेट होने का भी ज़्यादा खतरा रहता है। साथ ही ऐसे लोग धूम्रपान भी अधिक करते हैं।

बहुत से शोधों से यह बात भी पता चला है कि लोगों का नज़रिया उनके हार्ट रिस्क को बढ़ा सकता है। लेकिन यह सवाल बहुत अहम है कि क्या निराशावादिता को आशावादिता में बदला जा सकता है। तो आइए हम आपको बताते है वह उपाय जिनसे ऐसा हो सकता है।

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निराशावादिता को आशावादिता में बदलने के कुछ तरीके


ध्यान
हर रोज़ ध्यान करने से दिमाग के बांयी ओर के प्रिफ्रंटल लोब्स सक्रिय हो जाते हैं और यह हमारी हर रोज़ की परेशानियों से हमें बचाते हैं।

पाज़िटिव सोचना
हर रोज़ एक निगेटिव सोच के साथ एक पाज़िटिव सोच भी बनायें। जिससे धीरे धीरे यह आपकी आदत बन जायेगी और आपकी सोच नकारात्‍मक से सकारात्‍मक हो जाएगी।

एक डायरी बनायें
एक्सपर्टस का मानना है कि हर रोज़ सोने से पहले पूरे दिन में आपके साथ होने वाली तीन पाज़िटिव चीज़ें लिखने से आपमें पाज़िटिव सोच बनती हैं।

मनोरंजन करें
काम के साथ साथ मनोरंजन भी बहुत ज़रूरी है। मनोरंजन से भी आपके जीवन में सकरात्‍मकता आती है।

शारिरिक गतिविधि
एक्सरसाइज़ से दिमाग में एन्डार्फिन्स एक्टिवेट होते हैं, इसके लिए चाहे सुबह शाम टहलें या कोई व्‍यायाम कर लें।

अगर आप अपनी सोच को बदलना चाहते है तो इन सब चीजों को अपनाकर आप ये आसानी से कर सकते हैं। अगली बार जब आप गिलास को देखें तो इसको उल्टा कर के देखें और अपनी कुछ छोटी छोटी बातों को ध्यान में रखकर आप अपने आप को आशावादी बना सकते हैं।

 

 

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