डायबिटिक नेफरोपैथी के मरीज को करना पड़ सकता है कई चुनौतियों का सामना

By  , ओन्‍ली माई हैल्‍थ सम्पादकीय विभाग
Oct 24, 2013
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Quick Bites

  • गुर्दे खो देते हैं अपशिष्‍ट पदार्थों को साफ करने की क्षमता।
  • किडनी रोग से पीडि़त हो सकता है डायबेटिक नेफरोपैथी का मरीज।
  • किडनी से मूत्र में अधिक प्रोटीन की मात्रा का स्राव होने लगता है।
  • जीवनशैली सुधारकर किया जा सकता है डायबिटीज को दूर।

 

डायबिटिक नेफ्रोपैथी गुर्दे की बीमारी है। यह मधुमेह का एक प्रकार है। जब छोटे रक्त वाहिकाओं को नुकसान होता है, तो दोनों गुर्दे मूत्र में प्रोटीन्स का बहाव शुरू कर देते हैं। यदि रक्त वाहिकाओं को नुकसान होना जारी रहे, तो धीरे धीरे गुर्दे खून से अपशिष्ट उत्पादों को दूर करने की क्षमता खो देते हैं।

डायिबटीज जांच

डायबिटिक नेफरोपैथी किडनी का एक लगतार बढ़ते रहने वाला रोग है, जो किडनी की नसों में व्‍याधि के कारण होता है। ब्रिटिश डॉक्‍टर क्लिफोर्ड विल्‍सन ने (1906-1997) ने अपने जर्मन मूल के अमेरिकी डॉक्‍टर पॉल किमेल्‍स्‍टेल (1900-1970) के साथ डायबिटीज नेफरोपैथी सिंड्रोम को खोजा था। सन् 1936 में पहली बार इसका जिक्र किसी जर्नल में हुआ था।

 

यह बीमारी मधुमेह के ऐसे रोगियों में अधिक देखने को मिलती है, जिन्‍हें 15 वर्ष या उससे अधिक समय से डायबिटीज है। यानी आमतौर पर पचास से सत्तर वर्ष की उम्र के लोगों में यह बीमारी होने की आशंका होती है। यह बीमारी लगातार बढ़ती रहती है।

 

शुरुआती हमले के दो से तीन वर्ष के भीतर ही इसके कारण मरीज की मौत तक हो सकती है। महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों के इस बीमारी से ग्रस्‍त होने की आशंका अधिक होती है। अमेरिका में किडनी फेल्‍योर और किडनी की भयंकर बीमा‍री के लिए डायबिटीक नेफरोपैथी सबसे सामान्‍य कारण है।

 

ऐसा नहीं है कि केवल एक प्रकार के डायबिटीज मरीजों को यह बीमारी अपनी गिरफ्त में लेती है। टाइप वन और टाइप टू दोनों प्रकार के मरीज इस बीमारी की चपेट में आ सकते हैं। अगर आप रक्‍त में ग्‍लूकोज की मात्रा को नियंत्रित करने का प्रयास नहीं करते हैं, तो यह बीमारी अधिक खतरनाक रूप से हमला कर सकती है।

 

इसके साथ ही एक बार अगर यह बीमारी हो जाए, तो अनियंत्रित रक्‍तचाप रखने वाले मरीजों के लिए यह और खतरनाक हो जाती है। वे लोग जो हाई कोलेस्‍ट्रॉल के शिकार हैं, उनके लिए भी डायबिटिक नेफरोपैथी काफी खतरनाक हो सकती है।

 

डायबिटिक नेफरोपैथी की पहली पहचान ग्लोमेर्युल्स (किडनी में मौजूद होता है, यहां रक्‍त परिष्‍करण का पहला पड़ाव होता है) में उमड़ता है। इस स्‍टेज पर, किडनी पेशाब में अधिक मात्रा में सीरम का स्राव करने लगती है। इसकी पहचान के लिए संवेदनशील मेडिकल जांच से की जा सकती है। समय के साथ-साथ यह समस्‍या और विकराल होने लगती है। इस दौरान गांठदार ग्लोमेरुलोस्केलेरोसिस ग्‍लोमेरूली को पूरी तरह नुकसान पहुंचा देता है। इसके बाद पेशाब में जाने वाले एल्‍बुमिन की मात्रा और बढ़ जाती है। इस दौरान किडनी के उत्तकों की जांच से डायबेटिक नेफरोपैथी को आासानी से देखा जा सकता है।

 

धीरे-धीरे यह समस्‍या गंभीर होती जाती है। किडनी फेल्‍योर का खतरा भी काफी बढ़ने लगता है। यहां तक कि डायलाइसिस और ट्रांस्‍प्‍लांटेशन के बाद भी डायबिटीज के मरीजों की हालत अन्‍य लोगों की अपेक्षा अधिक खराब होती है।

 

संभावित चुनौतियां

 

  • हायपोग्‍लाइसेमिया (इनसुलिन का कम मात्रा में स्राव होना)
  • क्रॉनिक किडनी फैल्‍योर का खतरा
  • किडनी रोग का अंतिम पड़ाव
  • हायपरकलेमिया
  • किडनी प्रत्‍यारोपण का खतरा
  • डायबिटीज से जुड़ी अन्‍य समस्‍यायें
  • संक्रमण का खतरा

 

डायबिटीज यूं तो आम हो चली है, लेकिन यह बीमारी काफी खतरनाक होती है। सही जीवनशैली अपनाकर इस बीमारी को दूर रखा जा सकता है। इसके साथ ही हमें अपने आहार पर भी नियंत्रण रखना चाहिए।

 

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