क्षय रोग से संबंधी मिथक तथा भ्रांतियां

By  , द लिली एमडीआर-टीबी के सौजन्‍य से
Mar 22, 2012
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chhay rog se sambandhi mithak aur bhrantiyaयद्यपि आज हम यक्ष्मा‍ के बारे में बहुत कुछ जान गए हैं, यह भी कि वह एक ठीक होने वाला रोग है, फिर भी प्रतिदिन 5000 लोग तथा करीब 20 लाख लोग प्रतिवर्ष इस रोग से पीडित हो रहे हैं। इस रोग के बारे में बहुत लोगों के मन में भ्रांतियां बैठी हैं। आज हम उन भ्रांतियों को दूर कर रहे हैं।

 

मिथक : यक्ष्मा  आनुवांशिक है।

 

तथ्य  : यक्ष्माा आनुवांशिक नहीं है। यह संक्रमण से फैलने वाली बीमारी है। यह पीडित रोगी के खांसने से अथवा छींकने से हवा में बैक्टिया के फैलने से होती है। फिर भी, यह माता-पिता के द्वारा उनके बच्चोंक में आनुवांशिक रूप से नहीं होती है।

 

मिथक : यक्ष्माे केवल निम्न  सामाजिक आर्थिक स्थिति वाले लोगों को होती है।

 

तथ्य  : नहीं यह सत्यन नहीं है। यह समाज में किसी भी आयु समूह तथा सा‍माजिक आर्थिक तबके के लोगों को हो सकती है। यह पीडित रोगी के संपर्क में रहने वाले व्य क्ति, भीड-भाड वाले वातावरण में रहने वाले, उस स्थाोन पर यात्रा करने वाले लोगों को जहां यक्ष्माभ सामान्यल है, अस्पवताल अथवा नर्सिंग व्यसवस्थान से जुडे लोगों में अधिक होती है।

 

मिथक : धूम्रपान से यक्ष्मास होता है।


तथ्य  : संक्रमण का कारण माइकोबैक्टीसरियम यक्ष्माध है। धूम्रपान इसे बढा सकता है। यह अन्यव बीमारियों जैसे इंफासेमा (Emphysema), ब्रांकाइटिस (Bronchitis), तथा फेफडे के कैंसर (Lung cancer) को पैदा करता है।

 

मिथक : क्याक केवल यक्ष्माe रोग (सक्रिय टीबी) वाले लोगों को ही एंटीबायटिक्सर की जरूरत होती है?


तथ्य  :
यदि एक बार आप में पीपीडी/मैंटस जांच के द्वारा यक्ष्माव पॉजिटिव पाई जाती है तब आपको सीना का एक्स्-रे कराना होगा। यदि आपकी एक्सम-रे निगेटिव भी आती है, तब भी आपको एंटीबायटिक्स् का 6 माह अथवा 1 वर्ष का कोर्स लेना आवश्यिक है।


मिथक : मुझमें यक्ष्माि का कोई लक्षण नहीं है। इसलिए मुझे यक्षमा नहीं है।


तथ्य  - यदि आपमें यक्ष्मा  का काई लक्षण नहीं है तथ फिर भी आपका टेस्ट, टीबी के लिए पॉजिटिव है। तब इस स्थिति को छुपा हुआ टीबी कहा जाता है तथा इन परिस्थितियों में व्यथक्ति को कॉफी सक्रिय रहने की आवश्यछकता है ताकि छुपी हुई यक्ष्मा् सक्रिय यक्ष्माक में तब्दीटल न हो सके।

 

मिथक : जब हममें यक्ष्मा‍ का सक्रिय रूप समाप्तम हो जाता है, तब हमें एंटी‍बायटिक्स  बंद कर देना चाहिए?


तथ्य  : हमें टीबी का पूरा कोर्स ले लेना आवश्य्क है जो कि 9 माह से 18 माह की अवधि तक हा सकता है अन्यरथा रोगी में मल्टीू डग रेजीस्टें्ट टीबी (एमडीआर टीबी) होने की संभावना बहुत अधिक बढ जाती है जो कि प्राय: घातक होती है।


मिथक : यक्ष्मा् सिर्फ हमारे फेफडे को प्रभावित करती है।


तथ्य  : प्रारंभ में यक्ष्माे केवल फेफडों (80 प्रतिशत) को प्रभावित करती है। लेकिन इससे नाखून तथा बाल छोडकर शरीर का कोई भी भाग जैसे हृदय, मस्तिष्क।, हड्डी, त्वपचा इत्यालदि प्रभावित हो सकती है।

 

मिथक : सकारात्म क यक्ष्माे परीक्षण का अर्थ है कि वह व्योक्ति यक्ष्माे से से ग्रसित है।


तथ्य  :
एक सकारात्म्क मैंटक्स /पीपीडी यक्ष्मार स्क्री न टेस्टे केवल यह दर्शाता है कि उसमें माइकोबैक्टी रियम का संक्रमण है। यह इस तथ्यै को संपुष्टप नहीं करता है कि वह व्यकक्ति इस रोग से ग्रसित है। सकारात्मसक टीबी स्क्रीसन परीक्षण ही इस रोग के होने की संपुष्टि करता है।

 

मिथक : यक्ष्मात से पीडित व्य्क्ति को अस्प ताल में भर्ती होना चाहिए।

 

तथ्य  : यक्ष्माी से पीडित अधिकांश रोगियों का घर पर इलाज हो सकता है तथा वे कार्य को जारी रख सकते हैं।


हमें आशा है कि अब हम सब मिलकर इस रोग को नियंत्रित करने का अपना लक्ष्यइ पूरा करेंगे।


नोट : आधुनिक जीवन पद्धति में अस्तंव्यास्तयता एक स्थागपित सत्यथ बन कर उभरा है। जीवन की भागा-भागी में कई बार व्यमवस्थित जीवनशैली बेइंतहा प्रभावित हो जाती है। कैरियर एवं आर्थिक सफलता के मानदंडों को हासिल करने की प्राथमिकता इतनी प्रबली हो जाती है कि सुचारु जीवन प्रणाली से भारी समझौता करना मानो मजबूरी हो जाती है। ऐसे में सबसे ज्याचदा उपे‍क्षित हो जाता है स्वाास्य्जब । आजकल युवा पीढी स्वारस्य्े   मसलों को लेकर बेहद लापरवाह हो जाते हैं। शरीर पर लगातार क्षमता से ज्या दा दबाव पडने और गलत भोजन करने की बढती प्रवृत्ति के कारण युवाओं के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। ऐसे में टीबी जैसे संक्रमण के गिरफ्त में आ जाने की आशंका बढ जाती है। मेटो शहरों में, खासकर वैसे युवाओं में जो प्रतिस्प्र्धात्मआक नौकरियों में हैं या परिवार से दूर हॉस्टसलों में रहकर पढ रहे हैं, टीबी के संक्रमण के मामले जेजी से फैलते देखे गए हैं। नशा का जरूरत से ज्यारदा सेवन युवाओं के शरीर के प्रतिरोधक क्षमता को खोखला कर देता है। कम उम्र की युवतियों में कम खाकर और अनियोजित डायटिंग कर खूबसूरत दिखने की प्रवृत्ति बेहद खतरनाक रूप ले लेती है और टीबी के संक्रमण का खतरा बढ जाता है। जरूरत है युवाओं में स्वानस्य्ले  के प्रति बेहतर सजगता तथा जीवन चिंतन में स्वाबस्य् ज  की पहली प्राथमिकता।

टी बी का नियंत्रण

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